अंगद दत्ता की जनहित याचिका पर हाईकोर्ट सख्त, राज्य सरकार की निष्क्रियता पर उठे सवाल
ब्यूरो. शिक्षण संस्थानों में प्रधानगी संस्कृति को लेकर पंजाब यूथ कांग्रेस सचिव अंगद दत्ता की तरफ से दायर जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने पंजाब सरकार को दो महीने के भीरत कानून के अनुसार फैसला लेने के निर्देश दिया है। जिसमें कहा गया है कि दो माह के भीतर कारणयुक्त आदेश पारित करके और उसकी प्रति याचिकाकर्ता को उपलब्ध करवाई जाए।
यह आदेश CWP-PIL-33-2026 (अंगद दत्ता बनाम पंजाब राज्य एवं अन्य) मामले में माननीय मुख्य न्यायाधीश शील नागू और माननीय न्यायमूर्ति संजीव बेरी की खंडपीठ ने पारित किया है।
याचिका में अंगद दत्ता ने आरोप लगाया गया कि पंजाब के कई स्कूलों और कॉलेजों में बिना किसी वैधानिक चुनाव, बिना प्रशासनिक अनुमति और बिना कानूनी आधार के स्वयंभू प्रधान घोषित किए जा रहे हैं। जिससे कैंपस में टकराव और कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ रही है। छात्रों के बीच गुटबाजी और टकराव की स्थिति बन रही है। नाबालिग छात्रों को शक्ति प्रदर्शन और प्रतिस्पर्धा का हिस्सा बनाया जा रहा है।
वहीं सुनवाई के दौरान यह तथ्य रखा गया कि याचिकाकर्ता ने दिनांक 22 दिंसबर 2025 को संबंधित अधिकारियों को विस्तृत प्रतिनिधित्व भेजकर स्थिति की गंभीरता से अवगत कराया था, परंतु उस पर कोई ठोस निर्णय नहीं लिया गया।
याचिकाकर्ता के वकील प्रभसिमरन मान ने प्रभावी ढंग से पैरवी करते हुए अदालत को बताया कि प्रशासनिक स्तर पर कार्रवाई न होने के कारण न्यायिक हस्तक्षेप आवश्यक हो गया है। मामले में वकील दिलराज मान ने भी संवैधानिक और विधिक पहलुओं पर जोर देते हुए कहा कि राज्य का दायित्व है कि वह शैक्षणिक संस्थानों में कानून-व्यवस्था और छात्रों की सुरक्षा सुनिश्चित करे।
सुनवाई के बाद प्रतिक्रिया देते हुए अंगद दत्ता ने कहा कि शिक्षण संस्थान राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन या अवैध नेतृत्व संरचनाओं के केंद्र नहीं बन सकते हैं। पंजाब सरकार ने समय रहते कार्रवाई कर ली होती तो आज अदालत की शरण लेने की जरूरत न पड़ती। हाईकोर्ट ने सरकार को उनकी संवैधानिक जिम्मेदारी निभाने की याद दिलाई है। सरकार को कैंपस में बढ़ती अव्यवस्था और अवैध गतिविधियों पर अब जवाबदेही तय करनी होगी।


